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एक परिचय स्वामी श्री धनञ्जय जी महाराज

'स्वामी धनञ्जय महाराज' जो वैदिक आध्यात्मिक वाङ्गमयी व्यास परम्परा कि विलक्षण तथा रसमयी वाग्धारा को प्रवाहित करने वाले परम संत हैं । जो हास्यात्मक एवं कवित्व कला से परिपूर्ण भागवत कथा के माध्यम से भक्तों के मन को अनायास ही भगवान श्री मुरली मनोहर कृष्ण के श्री चरणों में लगा देते हैं ।।

पिता पं. श्री श्याम नारायण पाण्डेय एवं माता श्रीमती सुभद्रा देवी के यहाँ चौथे पुत्र के रूप में काशी (वाराणसी) में संवत 2032, भाद्रपद शुक्लपक्ष द्वादशी (वामन द्वादशी) दिन बुधवार को दिन में 12 बजे एक शुद्ध वैष्णव परिवार में स्वामी जी का जन्म हुआ ।।

रामानुज वैष्णव संप्रदाय के उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध संत जन्मना विरक्त वैष्णवाचार्य श्री श्री जगदाचार्य श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के अकिंचन शिष्य 'श्री श्री १००८ श्री जियर स्वामी जी महाराज' से वैष्णवता की दीक्षा एवं वैष्णव धर्म को जन-जन तक पहुँचाने का आदेश शिरोधार्य कर मंजिल की तलाश में चल पड़े ।।

'वेंकटेश स्वामी का मंदिर' सिलवासा (संघ शासित प्रदेश, दादरा एवं नगर हवेली) में भगवत्कृपा से सेवा का अवसर मिला । पूरी निष्ठा से भगवान की सेवा की । भगवान की कृपा से आज भागवत जी की कथा का देश-विदेशों में रसमय गायन करते हुए भगवद्भक्ति (भगवान के श्री चरणों) में अपना जीवन समर्पित कर आनन्द का अनुभव करते हैं ।।

पूज्य गुरुदेव 'स्वामी श्री धनञ्जय जी महाराज' अग्नि देव के उपासक हैं । तथा सिद्ध महापुरुष हैं, और जिस किसी को भी, एक बार भी, अपनी करुणा भरी दृष्टि से निहार लेते हैं, तत्काल उसका कल्याण हो जाता हैं ।।

।। लोक कल्याण मिशन चैरिटेबल ट्रस्ट, सिलवासा ।।
ऑफिस एड्रेस - शॉप नं. 4. गायत्री मंदिर के बगल में, मंदिर फलिया, आमली, सिलवासा ।।

Organization : LOK KALYAN MISSION CHARITABLE TRUST, SILVASSA.

Address       : Shop No. - 4, Just to Gayatri Mandir, Amli, Silvassa, India
State            : Dadra and Nagar Haveli
ZipCode       : 396230
Contact-No  : +91260 - 6538111.
Mobile-No  : +91-9375288850
Email           : dhananjaymaharaaj@gmail.com
                    : sansthaanam@gmail.com
Website       : www.dhananjaymaharaj.com

                    : www.sansthanam.com

''श्री वैष्णव सम्प्रदाय'' एक परिचय ।।

लक्ष्मीनाथ समारम्भां नाथयामुन मध्यमां ।।
अस्मदाचार्य पर्यन्तां बन्दे गुरुपरंपरां ।।

"श्री संप्रदाय" भागवत जी में परमादरणीय श्री शुकदेव जी महाराज ने, तथा अन्य संतों के द्वारा भी बताया गया है, की "विष्णो: इदं वैष्णवं'' अर्थात् जो विष्णु हैं, वैष्णव भी वही हैं" । वैष्णवों की महिमा अनंतानंत गाई गयी है, लगभग सभी शास्त्रों में । और साथ ही ये भी कहा गया है, कि लक्ष्मी चाहिए, तो विष्णु अथवा वैष्णवों की शरण ग्रहण करो । अपने आमदनी का दशांस भी किसी श्रेष्ठ वैष्णव ब्राह्मण को ही दान करना चाहिए ।।

''श्री वैष्णव'' के नाम से प्रसिद्ध ये संप्रदाय ''श्री संप्रदाय" है । क्योंकि इसकी आद्य प्रवर्तिका माता श्री महालक्ष्मी माता जी हैं । इस सम्प्रदाय की परम्परा के प्रथम आचार्य भगवान नारायण हैं । उनके बाद श्री नाथ मुनि, यामुनाचार्य (आलवन्दार) व रामानुज को ''मुनि जय'' कहा जाने लगा ।।

आचार्य परंपरा:-
१. लक्ष्मी नारायण भगवान् ।।
२. विष्वक्सेन ।।
३. शठकोप स्वामी जी महाराज ।।
४. श्री श्रीनाथ स्वामीजी महाराज ।।
५. श्री यामुनाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
६. श्री महापूर्ण स्वामीजी महाराज ।।
७. श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
८. श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
९. श्री वेदांत देशीक स्वामीजी महारज ।।
१०. श्री लोकाचार्य स्वामी जी महाराज ।।
११. श्री वर वर मुनि स्वामीजी महाराज ।।
१२. श्री कांची प्रतिवादी भयंकर स्वामीजी महाराज ।।
१३. श्री श्रीनिवासाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१४. श्री बड़े अनन्ताचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१५. श्री गादी अन्नाताचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१६. श्री विष्वक्सेन त्रिदंडी स्वामी जी महाराज ।।
१७. श्री देवनयाकाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१८. श्री राजगोपालाचार्य स्वामीजी महाराज ।।

यह परंपरा श्री पति पीठ की है, और इसी क्रम में ही श्री लक्ष्मी प्रप्पन जीयर स्वामी जी महाराज हैं ।।

श्री पति पीठ के संस्थापक श्री श्रीपति स्वामी जी महाराज, जो बड़े अन्नाताचार्य स्वामीजी महाराज के शिष्य थे, हैं ।।

श्रीमद्जगद्गुरुरामानुजाचार्य यतीन्द्र स्वामी श्रीरामनारायणाचार्य स्वामीजी महाराज कोसलेशसदन अयोध्या, ये भी हमारी वैष्णवी परंपरा के एक प्रसिद्द आचार्य रहे हैं ।।

श्रीरामानुजाचार्य एक उच्चकोटि के वैष्णवाचार्य थे । उनका जन्म वैशाख शुक्ल षष्ठी को दक्षिण के तिरुकुदूर नामक स्थान पर हुआ । इनके पिता श्री केशव भट्ट थे । रामानुज भगवान श्री संकर्षण के अवतार माने जाते हैं । इनका भक्ति सिद्धान्त ''विशिष्टा द्वैत'' के नाम से प्रसिद्ध है । उनका गीता तथा ब्रह्मसूत्र पर लिखा भाष्य ''श्री भाष्य'' कहलाता है, और इनके द्वारा विकसित श्री संप्रदाय ही ''श्री वैष्णव सम्प्रदाय'' के रूप मे आज प्रचलित है ।।

यामुनाचार्य, रामानुज के परम गुरु थे । जब रामानुज बहुत छोटे थे, तो इनके पिता का देहान्त हो गया । फिर उन्होंने काञ्ची में जाकर यादवप्रकाश नामक गुरु से वेदाध्ययन किया । अपनी कुशाग्र बुद्धि के बल पर वे गुरु के वक्तव्यों में ही दोष निकाल देते थे । उनकी इस आदत के कारण उनके गुरु भी उनसे ईर्ष्या करने लगे ।।

रामानुज बड़े ही विद्वान, उदार, धैर्यवान और सदाचारी थे । भक्ति मार्ग का प्रचार करते हुए उन्होंने बताया, कि भगवान पुरुषोत्तम ही प्रत्येक शरीर में साक्षी रूप में विद्यमान हैं । अपने अहंकार को त्यागकर भगवान की सर्वतोभावेन शरण ग्रहण करना ही जीव का परम पुरुषार्थ है । भगवान लक्ष्मी-नारायण जगत के माता-पिता हैं, और सभी जीव उनकी संतान हैं । अत: माता-पिता का प्रेम व उनकी कृपा प्राप्त करना ही संतान का परम धर्म है ।।

वाणी से उनका नाम लेना और मन-वाणी एवं शरीर से उनकी ही सेवा करनी चाहिए । भगवान के इस दासत्व की प्राप्ति ही मुक्ति है । भगवान सर्वान्तर्यामी, अनन्तानन्त, कर्मफल दाता तथा सृष्टिकर्ता और सद्गुणों के सागर हैं । अत: सर्वस्व निवेदन के रूप में शरणा-भक्ति ही भगवान की प्रसन्नता का प्रधान साधन है । अत: रामानुज ने दैन्य भाव की प्रतिष्ठा की है । उन्होंने अपनी रचना शरणागत गद्य, श्री रङ्ग गद्य तथा बैकुण्ठ गद्य (गद्यत्रय) में प्रेमा भक्ति का विस्तृत वर्णन किया है ।।

रामानुजाचार्य ने अपने कृत्यों तथा व्यवहार में प्रेम, सहिष्णुता, शरणागति, उत्साह, समदर्शिता तथा उदारता का परिचय दिया है । अपने ईष्ट देव के प्रति समर्पण के लिए उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन को भी त्याग दिया, क्योंकि वे इसे अपने उद्देश्यों की पूर्ति में बाधा मानते थे । श्री रङ्गम् जाकर उन्होंने यतिराज नामक संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली । उनके गुरु यादव प्रकाश भी उनके पास आ गए । रामानुज ने तिरुकोट्टियूर के महात्मा नाम्बि से अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) की भी दीक्षा ली ।।

महात्मा नाम्बि ने इस मन्त्र को देने के बाद उन्हें इस मन्त्र को गुप्त रखने का आदेश दिया । कहा ये मन्त्र बड़ा ही शक्तिशाली है, किसी को भी सुनने मात्र से मुक्ति दे देता है किन्तु रामानुज ने सभी वर्गों के लोगों को बुलाकर वह मन्त्र सुना दिया । नाम्बि उनसे रुष्ट हो गए और क्रोधित होकर कहा, तुमने मन्त्र को गुप्त न रखकर अपराध किया है, जिसके बदले तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा । इस पर रामानुज ने सविनय उत्तर दिया, भगवन् ! यदि इस मन्त्र का उच्चारण करके हजारों व्यक्ति नरक की यन्त्रणा से बच सकते हैं, तो मुझे नरक भोगने में आनन्द ही मिलेगा । उनके इस उत्तर से गुरु नाम्बि का क्रोध शान्त हो गया ।।

रामानुज भक्ति, चरित्रबल तथा विद्वता में भी अद्वितीय थे । इन्हें कुछ योग सिद्धियां भी प्राप्त थीं, और इनके बल पर उन्होंने काञ्ची नगर की राजकुमारी को प्रेत बाधा से मुक्त कर दिया । जब महात्मा आलवन्दार (यामुनाचार्य) मृत्यु शैय्या पर थे, तो उन्होंने रामानुज को अपने पास बुलाया किन्तु रामानुज के श्री रङ्गम् पहुंचने से पहले ही उन्होंने प्राण त्याग दिए । रामानुज ने देखा कि उनके हाथ की तीन उंगलियां मुड़ी हुई हैं । इसका कारण कोई न जान सका किंतु रामानुज समझ गए, कि यह संकेत उनके लिए है, जिसे वे मृत्यु से पहले बताना चाहते थे ।।

उन्होंने अनुमान लगाया, कि यामुनाचार्य मेरे द्वारा ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और आलवन्दारों के ग्रन्थ का ''दिव्य प्रबन्धम्'' की टीका करवाना चाहते हैं । फिर उन्होंने उनके मृत शरीर को प्रणाम किया और कहा, भगवन् ! मुझे आपकी आज्ञा शिरोधार्य है । मैं इन तीनों ग्रन्थों की टीका लिखूंगा । उनके ऐसा कहते ही आलवन्दार की तीनों उंगलियां सीधी हो गईं । तत्पश्चात् रामानुज उनके प्रधान शिष्य पेरियनाम्बि से विधिपूर्वक वैष्णव दीक्षा लेकर भक्ति मार्ग में लीन हो गए ।।

उन्होंने वेदान्त सूत्रों पर लिखा ''श्री भाष्य'' सबसे पहले कश्मीर के विद्वानों को सुनाया । इनके प्रधान शिष्य का नाम कूरत्तावलार (कुरेश) था । उनके दो पुत्रों से रामानुज ने विष्णु सहस्त्रनाम तथा दिव्य प्रबन्धम् की टीका लिखवाई । रामानुजाचार्य ने कई मंदिरों का निर्माण तथा पुन: निर्माण करवाया ।।

श्री रामानुज के सिद्धान्त या आचार-मीमांसा में मानसिक भक्ति तथा व्यवहार शुद्धि पर भी विशेष बल दिया गया है । उन्होंने अपने ग्रन्थों में वैष्णवों के लिए पंचकालोपासना का विधान किया है । उन्होंने दान देने को सर्व श्रेष्ठ कर्म कहा है । उन्होंने बताया कि अपने द्रव्य को दूसरे की सम्पत्ति बना देने तक का त्याग ही ''दान'' है । उन्होंने भक्ति के सात सोपान बताए जिन पर चलते हुए भगवान की विशेष कृपा भी प्राप्त हो जाती है ।।

अंत में जब उनके परमधाम गमन का समय आ गया, तो उनका शरीर कृषकाय हो चुका था । फिर भी वे शिष्यों सहित कावेरी तक पहुंच गए । अंतिम समय में भी उन्होंने नित्य-नैमित्तिक कृत्यों को करने की सदाचारमय महत्वपूर्ण शिक्षा दी । उनका जन्म ई. 1017 में हुआ और ब्रह्मलीन हुए 1137 में एक सौ बीस वर्ष तक अपनी सांसारिक यात्रा सम्पन्न करके वे परमधाम को प्रस्थान कर गए ।।

उत्तर भारत के गुरुपरंपरा के बहुत से प्रसिद्द आचार्यों में आचार्य श्रीमद्विश्वक्सेनाचार्य जगदाचार्य श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज रहे हैं जिनके द्वारा बहुत से वैष्णव धाम, मंदिर और आचार्य बनाये गए तथा वैष्णव धर्म को प्रसारित किया गया ।।

श्री श्री त्रिदंडी स्वामीजी महाराज ने ७४ चातुर्मास यज्ञ किये थे, और उनके द्वारा कृत ऐसे साधारण लक्ष्मीनारायण महायज्ञों कि संख्या सैकड़ों में है । उत्तर भारत में वैष्णव धर्म का विस्तार श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज ने किया । भगवान शेषजी के ही अन्य पार्षद, श्रीमद विष्वक्सेन त्रिदंडी स्वामी जी के रूप में अवतरित हुए थे, और उत्तर भारत समेत सम्पूर्ण धरा पर वैष्णव धर्म का प्रचार किया ।।

श्री श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज, वेदों के अद्भुत विद्वान् एवं प्रखर वक्ता थे । जिन्होंने शास्त्रार्थ में किसी को भी नहीं बख्सा । लेकिन अपने उग्र स्वभाव और धर्म के प्रति कट्टरता के वजह से, उन्होंने धार्मिक समाज में अपनी एक अगल ही पहचान बनायीं थी । भगवान स्वयं उनकी सेवा करने को आते थे । नैष्ठिक बालब्रह्मचारी, १०० ग्राम से भी कम गाय का दूध अल्पाहार के रूप में लेते थे । अद्भुत तेज से संपन्न और अपना त्रिदंड जिसपर भी गिराते उसका कल्याण हो जाता था । आज भी उनके त्रिदंड से मार खाकर जिन लोगों का कल्याण हुआ है, वो उनके जाने के वर्षों बाद भी, उनके पैरों के निचे की मिटटी उठाकर, घर लाकर पूजते हैं ।।

लेकिन भारत की आजादी और महात्मा गाँधी का धर्म निरपेक्षता की उद्घोषणा ने इन विधर्मियों को आजादी दे दी । जिसके वजह से शास्त्रार्थ तो होता, सबको हरा भी दिया जाता था, लेकिन दण्डित करने का अधिकार समाप्त हो गया । जिसका परिणाम आज वैदिक सनातन धर्म की स्थिति के रूप में आपके सामने है । फिर भी प्रातः स्मरणीय पूज्य पाद श्री त्रिदंडी स्वामी जी, ने अपनी उग्रता को बरकरार रखते हुए ही वैष्णव धर्म को लक्ष्मी नारायण यज्ञों के माध्यम से तथा अपने उपदेशों के माध्यम से जीवित रखा ।।

१०० वर्षों से अधिक इस धरा-धाम पर वैष्णव धर्म को प्रसारित करते हुए । काशी के शिवपुर नामक ग्राम में लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के दौरान ही स्वामी जी ने कहा की लक्ष्मीप्रपन्न को बुलाओं और सभी वैष्णवाधिराज लोग ये सोंचते ही रह गए की स्वामी जी, का उत्तराधिकार हमें मिलेगा । इतने में ही स्वामी जी ने श्री श्री १००८ श्री लक्ष्मीप्रपन्न जियर स्वामी जी को बुलाया, और अपना उत्तराधिकार तथा अपनी गद्दी तथा अपना सम्पूर्ण वर्चस्व सौप दीं, और साथ ही सबको निर्देश दिया की तुमलोग कहते थे, न की स्वामी जी आपकी उग्रता से डर लगता है । लेकिन अब तुमलोगों को मेरा सौम्य रूप देखने को मिलेगा जियर स्वामी के रूप में, और ब्रह्मलीन हो गए ।।

।। नमों नारायण ।।

जय श्रीमन्नारायण,

मेरे सभी युवा मित्रों को नमस्कार, मैं ये चाहता हूँ, कि आप सभी अपने धर्म (मानव धर्म) के बारे में जानें । हमारा धर्म, हमारे वेद पूर्णतः विज्ञान है, लेकिन इस तथ्य पर आजतक किसी ने भी कोई प्रकाश नहीं डाला । यही कारण है, कि हमारा धर्म हमारे ही लोगों की नज़रों में उपेक्षित सा हो गया है ।।

हमारे लगभग सभी आचार्यों ने केवल राम कथा और कृष्ण कथा कह कर हमारे धर्म को सांप्रदायिक बना कर रख दिया है । लेकिन मूल रूप में हमारे धर्म का, हमारे शास्त्रों और वेदों का हर एक सूत्र सृष्टि के सर्वोत्तम विज्ञान को दर्शाता है । आवश्यकता है, केवल हमें उस तरफ अपने कदमों को बढाने की ।।

और इसीलिए मैं आशा करता हूँ, कि जिस दिन हमारे देश की युवा पीढ़ी अपने धर्म अपने वेदों के प्रति अपनी जिम्मेवारी समझ लेगी, उस दिन किसी भी देश की खोज के पीछे हम नहीं बल्कि हमारे अनुसन्धान के पीछे दुनियां के सभी देश आयेंगें ।।

इसी अपेक्षा के साथ, नारायण से यही प्रार्थना है, कि हमें और हमारी युवा पीढ़ी को धर्म के साथ-साथ विज्ञान के अनुसन्धान की पूरी शक्ति और ज्ञान दें ।।

।। नमों नारायण ।।

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आप सभी मेरी इस एक बात पर ध्यान दें, मैं बराबर कहता हूँ, की एक ही बात को केवल रटने से हमारा समाज कही न कही टूटता हुआ नजर आता है । क्या ऐसा हमारे यहाँ कोई हुआ जिसने कभी कोई नई बात सोंची या बताई हो ? अथवा बताने का कभी प्रयास भी किया हो ।।

मैं बताता हूँ, हमारे वेद, हमारे शास्त्र और हमारे धर्म के सभी सिद्धांत नए-नए खोज से परिपूर्ण (with Researchable) हैं । एक उदहारण से बताता हूँ, जैसा की हमें पढाया जाता है, की न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज की, जबकि यह बात पूर्णतया असत्य है ।।

क्यों सत्य नहीं है ? क्योंकि हमने अपने शास्त्रों को महत्त्व नहीं दिया, हमने या हमारे किसी आचार्यों ने कभी इस विषय में अपने शास्त्रों का अवलोकन नहीं किया ।।

आइये देखें की हजारों वर्ष पहले ही इस सिद्धांत के प्रतिपादक भास्कराचार्य क्या कहते हैं, कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र होती है ।।

आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं  गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या ।।
आकृष्यते तत्पततीव भाति - समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।
- सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय - भुवनकोश.

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है । पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह पृथ्वी पर गिरते हैं । पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे हों तो कोई कैसे गिरे ? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं, क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं ।।

मित्रों, सर्वप्रथम हमारे यहाँ पानी के जहाज होते थे, पुष्पक विमान हमारे यहाँ था । दूरदर्शन की सर्वोत्कृष्ट गुणवत्ता महाभारत की कथा धृतराष्ट्र को सुनाने हेतु उस काल  में वेदव्यास जी के द्वारा संजय को दी गयी विद्या है । परन्तु हमारे कुछ अल्पज्ञानी आचार्यों ने इनकी कथाएं तो खूब सुनाई, लेकिन कभी इस विषय में न खुद सोंचा न समाज को सोंचने दिया ।।

ऐसे ही अगर यह कहा जाय की विज्ञान के सारे आधारभूत अविष्कार भारत भूमि पर हमारे विशेषज्ञ ऋषि मुनियों द्वारा हुए, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । सबके प्रमाण उपलब्ध हैं, आवश्यकता स्वभाषा में विज्ञान की शिक्षा दिए जाने की है ।।

मेरा ये विचार है, कि समाज को भागवत कथा एवं राम कथा के माध्यम से ही एक नई सोंच की ओर ले जाऊँगा । ताकि हमारे यहाँ भी वैज्ञानिक विचारधारा का अविर्भाव हों, और अपने शास्त्रों में हमारे पूर्वज ऋषियों द्वारा प्रदत्त गूढ़ ज्ञान से कुछ नया खोज करें और दुनियां को बताएं कि हम किसी से कभी भी कम नहीं थे और आज भी कम नहीं हैं ।।

इस लक्ष्य (Mission) को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने हेतु आपका सहयोग अपेक्षित है । आपके कल्याण का आकांक्षी स्वामी धनञ्जय महाराज ।।

।। नमों नारायण ।।

 
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