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सत्कर्म ही सच्चा कर्म है ।।

जय श्रीमन्नारायण,

नास्तिकः पिशुनश्चैव कृतघ्नो दीर्घदोषकः ।
चत्वारः कर्मचाण्डाला जन्मतश्चापि पञ्चमः ।।

अर्थ:- नास्तिक, निर्दयी, कृतघ्नी, दीर्घद्वेषी, और अधर्मजन्य संतति - ये पाँचों कर्मचांडाल हैं ।।

अर्थात् जो नास्तिक है, वो अपने ही कर्मों से चांडाल है । जिनके अन्दर दया नहीं है, वो भी अपने कर्मों से ही चांडाल है । जो कृतघ्न है और जो नित्य ही दूसरों के दोषों को ही देखने में लगा रहता है, वो भी अपने ही कर्मों से चांडाल है । परस्त्री पर बुरी नजर रखने वाले भी अपने ही कर्मों से चांडाल होते हैं । अभिप्राय यह है, कि ये उपर्युक्त दोष व्यक्ति अपना सुधार सकता है । और अगर नहीं सुधारता तो ये उसका कर्मदोष है, और यही कर्म उसे अपने ही कर्मों से चांडाल बना देती है ।।

।। नमों नारायण ।।

 
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भगवान के सभी भक्तों को दीपावली एवं नववर्ष की हार्दिक शुभकामना, नए वर्ष में भगवान नारायण एवं माँ महालक्ष्मी की पूर्ण कृपा से आप सभी ओत-प्रोत रहें ।। नमों नारायण ।।
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