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Gyan Ki Sat Bhumikayen - Bhagwat Katha.

"श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे ।
हे नाथ नारायण वासुदेव ।।"

यह महामन्त्र है । अर्थ - ज्ञान सहित इस मन्त्र का जाप करो -

श्रीकृष्ण - हे प्रभो आप सभी के मन को आकर्षित करने वाले है, अतः आप मेरा मन भी आकर्षित
कीजिए ।

गोविन्द - इन्द्रियोँ के रक्षक भगवन्, आप मेरी इन्द्रियो को स्वयं मेँ लीन करेँ ।

हरे - हे दुःख हर्ता, मेरे दुःखोँ का भी हरण करेँ ।

मुरारे - हे मुर राक्षस के विजेता, मेरे मन मेँ बसे काम क्रोधादि राक्षसोँ का नाश कीजिए ।

हे नाथ - आप नाथ हैँ और मैँ आपका सेवक ।

नारायण - मैँ नर हूँ आप नारायण हैँ ।
वासुदेव - वसु का अर्थ है प्राण, मेरे प्राणोँ की रक्षा करेँ । मैने अपना मन आपके चरणो मेँ अर्पित कर दिया ।

ज्ञान की सात भूमिकाएँ ।।।।
1.शुभेच्छा -- आत्मकल्याण हेतु श्रोत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ गुरु के शरणागत होकर उनके उपदेशानुसार शास्त्रो का अध्ययन करके आत्म विचार और आत्मा साक्षात्कार की उत्कृष्ट इच्छा ।।।

2.सुविचारणा - सद्गुरु के उपदेशो तथा मोक्षशास्त्रो का चिन्तन एवं मनन ।

3.तनुमानसा - श्रवण, मनन, और निदिध्यासन से शब्दादि विषयो के प्रति जो अनासक्ति होती है एवं सविकल्प समाधि मे अभ्यास से बुद्धि की जो तनुता - सूक्ष्मता प्राप्त होती है, वही तनुमानसा  है ।।

4.सत्वापत्ति - उपर्युक्त तीन से साक्षात्कार पर्यन्त स्थिति अर्थात् निर्विकल्प समाधिरुप स्थिति ही सत्वापत्ति है । ज्ञान की चौथी भूमिका वाला पुरुष ब्रह्मविद कहलाता है ।।।

5 .असंसक्ति - चित्त-विषयक परमानन्द और नित्य अपरोक्ष ऐसी ब्रह्मात्म भावना का साक्षात्कार रुप चमत्कार असंसक्ति है । इसमेँ अविद्या तथा उसके कार्यो का सम्बन्ध नहीँ होता ।

6 .पदार्थभाविनी - पदार्थो की दृढ अप्रतीति होती है वह पदार्थभाविनी है ।।।

7 .तुर्यगा - तीनो अवस्था से मुक्त होना तुर्यगा है । ब्रह्म को जिस अवस्था मेँ आत्मरुप और अखण्ड जाने वही अवस्था तुर्यगा है ।।।

प्रथम तीन भूमिकाएँ साधनकोटि की है, और अन्य चार ज्ञानकोटि की है । तीन भूमिकाओ तक सगुण ब्रह्म का चिन्तन करो । ज्ञान की पाँचवी भूमिका तक पहुँचने पर जड चेतन की ग्रन्थि छूट जाती है और आत्मा का अनुभव होने लगता है ।।

आत्मा शरीर से भिन्न है । इन भूमिकाओ मेँ उत्तरोत्तर देहभान भूलता हुआ उन्मत्त दशा प्राप्त होती है ।।

 
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