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आचारः प्रभवो धर्मः ।।

धन्वन्तरिक्षपणकामरसिंह शङ्कु , वेताल भट्ट घटकर्पर कालिदासाः ।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां, रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ।।

अर्थ:- धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटकर्पर, कालिदास, वराह, मिहिर और वररुचि - ये महाराज विक्रम के नवरत्नों जैसे नौ कवि हैं । इन्होने अपने परिश्रम और अपने आचरण से ही अपना स्थान बनाया है ।।

 
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