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Raja Ambarish - Bhagwat Katha.

स वै मन: कृष्णपदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठगुणानुवर्णने ।
करौ हरेर्मन्दिरमार्जनादिषु श्रुतिं चकाराच्युतसत्कथोदये ।।

भगवद्भक्ति का एक अनोखा नजारा भागवत के इन श्लोकों में, देखिये--यह श्लोक राजा अम्बरीष के विषय में भागवत में लिखा गया है, इसका अर्थ इस प्रकार है -उनका मन सदा के लिए कृष्ण के श्री चरणकमलों में लगा हुआ था, वाणी उन्हीं के गुणानुवाद (गुणों के वर्णन) में लगी रहती थी । जिनके हाथ जब भी उठते श्रीभगवान के मंदिर के सफाई के लिए ही उठते, और कान सिर्फ भगवान कि कथा सुनने को आतुर रहते थे ।।

मुकुन्दलिङ्गालयदर्शने दृशौ तद्भृत्यगात्रस्पर्शें$गसंगमम् ।
घ्राणं च तत्पाद सरोज सौरभे श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते ।।

अर्थ:- आँखें सदैव हरि मूर्ति दर्शन को प्यासी रहती थी और अपने शरीर से भक्तों कि सेवा में ही लगे रहना चाहते थे । उनकी नासिका भगवान के श्रीचरणों में चढ़ी हुई श्रीमती तुलसी देवी के सुगन्ध लेने में तथा अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए भगवान को अर्पित नैवेद्य के स्वाद में लगा दिया ।।

पादौ हरे: क्षेत्रपदानुसर्पणे शिरो हृषीकेशपदाभिवन्दने ।
कामं च दास्ये न तु कामकाम्यया यथोत्तमश्लोकजनाश्रया रतिः ।।

अर्थ:- अपने पैरों को उन्होंने तीर्थ दर्शन हेतु पैदल चलने में लगा दिया और सिर तो सदैव भगवान के श्रीचरणों में झुके ही रहते थे । माला, चन्दनादि जो भी दिखावे अथवा भोग सामग्रियाँ जो भी थीं, वे सब उन्होंने भगवान के श्रीचरणों में अथवा अलंकार हेतु समर्पित कर दिया और भोग भोगने अथवा भोगों की प्राप्ति हेतु नहीं, अपितु भगवत्चरणों में निर्मल भक्ति की प्राप्ति हेतु अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया ।।

ये होती है निर्मल भक्ति का स्वरूप जो शास्त्रानुसार है, और ये राज अम्बरीष जी में पूर्णतया थी । और उनका यही स्वभाव दुर्वासा जैसे ऋषि के उपर भी एक बार भारी पड़ गया ।।

वो हुआ यूँ, कि एक दिन दुर्वासा जी भोजनार्थ अपने सहस्रों शिष्यों के साथ राजा अम्बरीष जी के यहाँ पहुंचे । उस दिन द्वादशी थी, अर्थात एकादशी का पारण और समस्या ऐसी थी, कि थोड़ी ही देर में अर्थात जल्द ही त्रयोदशी लगने वाली थी । और पारण द्वादशी में ही करना होता है प्रदोष लगने से पहले ।।

अब दुर्वासा ऋषि को ये बात ज्ञात थी, फिर भी वो लेट हो रहे थे । अब अम्बरीष जी ने अपने पुरोहित जी से पूछा - कि प्रभु ये बताएं कि दरवाजे पर कोई अतिथि आया हो, तो हम बिना उन्हें भोजन करवाए स्वयं पारण कैसे कर सकते हैं । और ना करें, तो मुहूर्त निकला जा रहा है, ऐसे में हम करें तो क्या करें ।।

पुरोहित जी ने कहा- राजन ! अगर आप ठाकुर जी का चरणोदक ग्रहण कर लेंगें, तो आतिथ्य का अपमान भी नहीं होगा और आपकी पारण की प्रक्रिया भी पूरी हो जाएगी ।।

राजा अम्बरीष ने वैसा ही किया, लेकिन दुर्वासा जी भड़क गए और गुस्से से जलते हुए कहा- कि तुझे दण्ड मिलेगा, और अपने जटाओं से एक बाल उखाड़कर पृथ्वी पर पटक दिया । उससे एक भयंकर कृत्या उत्पन्न हुई और अग्नि कि ज्वाला के सामान धधकती हुई, जलाकर भस्म कर देने के लिए राजा अम्बरीष की ओर बढ़ी ।।

लेकिन अम्बरीष इतने बड़े भगवान के भक्त थे, कि उनकी रक्षा के लिए स्वयं अपने सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर रखा था भगवान ने । अब कृत्या जैसे ही आगे बढ़ी, राजा घबराए नहीं, अपने स्थान पर खड़े रहे । लेकिन सुदर्शन महाराज ने काम करना शुरू किया और कृत्या को जलाकर भस्म कर दिया । कृत्या को जलाने के बाद चक्र महाराज चुप नहीं बैठे, दुर्वासा जी की ओर लपके ।।

दुर्वासा जी घबराए, और भागने लगे । अपने इन्द्रादि सभी समर्थ यजमानों के पास गए, लेकिन सबने कहा- महाराज यहाँ से आप जाइए, वरना ये सुदर्शन महाराज हमें भी नहीं छोड़ेंगें । अंत में भगवान नारायण के पास दुर्वासा जी गए अपने बचाव की गुहार लगाई ।।

लेकिन नारायण ने कहा -
अहं भक्त पराधीनो ह्यस्वतंत्र इव द्विज ।
साधूभिर्ग्रस्तहृदयों भक्तैर्भक्तजनप्रियः ।।

अर्थ:- भगवान ने कहा- दुर्वासा जी ! मैं पूरी तरह से भक्तों के अधीन हूँ, मेरे वश में कुछ भी नहीं है । मेरे सीधे-सादे सरल भक्तजन अपने उदार ह्रिदय से विनम्रता पूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, तो मैं स्वतः उनके वशीभूत हो जाता हूँ, और उनसे प्यार करने लगता हूँ, अब वो जो कहें वही होता है, मेरे कहे अनुसार कुछ होता ही नहीं, अत: मैं आपकी मदद नहीं कर सकता ।।

।। नमो नारायण ।।

 
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