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मन का कंटक ।।



मन का कंटक ।।

अन्तर्गतं महाशल्यं अस्थैर्यं यदि नोदधृतम् ।
क्रियौषधस्य कः दोषः तदा गुणमयच्छतः ।।

अर्थ:- अस्थिरता का कंटक यदि मन में है और उसे यदि बाहर नहीं निकाला जाय, तो बाद में क्रियारुपी औषधी न करे तो उस में क्या दोष ?

 
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