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चक्रवत्परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ।। Shrimad Bhagwat Katha - Swami Dhananjay Maharaj.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, इस संसार में सुख-दुःख में सम रहने वाला व्यक्ति ही स्वर्ग और मोक्ष का अधिकारी होता है । सुवचनानी में लिखा है -

चक्रवत्परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ।।

अर्थ:- चक्र की तरह सुख और दुःख भी चलायमान हैं, इसलिए सुख में फूलो मत और दुःख में तड़पो मत । क्योंकि हर समय एक जैसा रहने वाला व्यक्ति ही इह लोक में सुखी और परलोक में मोक्ष का अधिकारी होता है ।।

इसलिए हमें भगवान का स्मरण करना चाहिए । सुख-दुःख हमारे अपने ही कर्मों का फल है । हम जैसा करते हैं वैसा ही पाते हैं । अवश्यमेव भुक्तब्यं कृतं कर्म शुभाशुभं ।।

शुभ अथवा अशुभ जैसा हम करेंगे वैसा ही हमें मिलेगा । अत: हमें अपने जीवन में ज्यादा से ज्यादा शुभ कर्म करना चाहिए ताकि हमें शुभ फल ही मिले ।।

एक बेकरी बेचने वाला किसी गाँव में बेकरी बेचने जाता था । एक किसान के बच्चे बेकरी देखकर खाने के लिए रोने लगे । अब बेचारा गरीब किसान कहाँ से बेकरी ख़रीदे ? किसी ने उसे सुझाव दिया की तुम्हारे पास मक्खन है उसके बदले में बेकरी वाले से बेकरी ले लिया करो ।।

उस किसान ने उस बेकरी वाले से सौदा पक्का कर लिया की वो उसे जितना माखन देगा बदले में बेकरी वाला उसे उतना ही बेकरी देगा । कुछ दिनों तक ये सिलसिला चलता रहा । एक दिन बेकरी वाले ने उस गाँव के सरपंच से शिकायत कर दी, की आपके गाँव का किसान चोर है । और उसने कारण बताया की वो उस किसान को एक किलो बेकरी (पाव रोटी) देता है जबकि किसान उसे 500 ग्राम ही माखन देता है । जबकि सौदा बराबरी का तय हुआ था ।।

अब सरपंच जी की पंचायत लगी और सरपंच ने पूछा - की भाई ऐसा क्यों किया ? किसान ने पूछा की क्या किया हमने ? सरपंच ने बताया की एक किलो बेकरी के बदले एक किलो माखन देने की बात तय हुई थी तुम दोनों में ? किसान ने कहा - हाँ । फिर सरपंच ने किसान के दिए हुए माखन का सबके सामने वजन करवाया तो बेकरी वाले की बात सच निकली । माखन आधा किलो ही था ।।

फिर तो मामला साफ हो गया की किसान चोर है । सरपंच ने सजा का एलान करना चाहा तभी बीच वाला व्यक्ति वहां पहुंचा और कहा - की मालिक इसके पास कोई बाट (तौलने वाला) नहीं है । इस किसान के पास सिर्फ एक तराजू है । ये जो बेकरी उसे देता है, किसान एक पलड़े पर बेकरी रखकर दुसरे पर माखन रखकर बराबर करके दे देता है ।।

अब आप फैसला करो की चोर कौन है ? तो चोर तो बेकरी वाला ही निकला । और सजा उस किसान के जगह उस बेकरी वाले को हुई । क्योंकि चोरी तो वही कर रहा था । और अपनी ही चालाकी के वजह से पकड़ा भी गया ।।

मित्रों, अभिप्राय यह है, कि उस परमात्मा के पास भी उस किसान की तरह कोई बाट नहीं है । वो भी सिर्फ एक तराजू रखता है, और हमारे ही कर्मों को एक पलड़े में रखकर दुसरे में उसके फल को रख देता है ।।
इसीलिए हमारे बुजुर्गों ने कहा है, की जैसी करनी वैसी भरनी ।।

हम जो करेंगे हमें वही मिलेगा अथवा मिलता है, इसलिए अधिकार और धन जीवन में एक बार मिलता है । उसका सदुपयोग करने वाला मर कर भी अमर हो जाता है जबकि भोग करने वाला जीतेजी मर जाता है ।।
कहीं सुना था - 100 दिन जीने से अच्छा एक दिन जियो और ऐसा कुछ कर जाओ की जन्म-जन्म तक लोग तुम्हें याद करते रहें ।।
भगवान लक्ष्मीनारायण सभी का नित्य कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

।। नमों नारायण ।।

 
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