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हमारे वैदिक संस्कृति में जो मुक्ति एक शब्द है, उसका अभिप्राय क्या है ।।

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, संसार में और हमारे वैदिक संस्कृति में जो मुक्ति एक शब्द है । इसके लिए बहुत ही बहस हमारे विद्वानों में हुई है, हुई थी और होती रहेगी ।।

लेकिन मुक्ति के लिए हमारे एक मित्र ने प्रश्न किया था इसलिए आज इस विषय पर मैं कुछ लिख रहा हूँ, अन्यथा मैं भक्ति योगी हूँ, मेरा सिद्धांत है कुछ भी करो परमात्मा का नाम लेकर करो और उसका ही होकर जिओ ।।

इस विषय में पहली बात तो यह है, कि ये आपको स्वयं ही करना पड़ता है, इसके लिए आप किसी अन्य का सहारा नहीं ले सकते । अर्थात किसी दुसरे के किसी साधना अथवा कृपा के भी करने से आपको मुक्ति नहीं मिल सकती ।।

इस मार्ग में गुरु ही एकमात्र सहारा होता है । लेकिन कई बार ऐसा भी देखा गया है, की कोई गुरु स्वयं ही मुक्त नहीं हो पाता जबकि शिष्य मुक्ति का स्वाद चख लेता है । तो इस मार्ग में ऐसा नहीं है, कि आप ये सोचेंगे की जो उपदेश कर रहा है, वो स्वयं ही जब मुक्त नहीं है तो फिर दूसरों को मुक्ति का उपदेश क्या करेगा ? जबकि ऐसा नहीं है ।।

दूसरी बात यह है, कि इस तरह का मन में ख्याल आना ही बहुत बड़ी बात है । क्योंकि-

दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रह हेतुकम ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुष संश्रयं ।।

अर्थ:- इस संसार में तीन बातें बहुत ही दुर्लभ है । जो बहुत ही पूण्य के बाद भगवान की अनन्य कृपा के बाद प्राप्त होती है । १.मनुष्य शरीर का मिलना ।। २.मुमुक्षु होना अर्थात मोक्ष की जिज्ञासा वाला होना ।। और ३.ऐसे किसी महापुरुष का मिलना जो इसका मार्ग बताये ।।

ऐसी ही एक छोटी सी वार्ता गुरु शिष्य की आज आपलोगों के सामने रखता हूँ । इस वार्ता में शिष्य का प्रश्न सुनकर गुरु का हृदय गदगद हो जाता है और इतनी प्रशंसा करता है शिष्य की कि शायद ये प्रषंग आपलोगों को भी अवश्य पढ़ना चाहिए ।।

शिष्य उवाच:-
कृपया श्रूयतां स्वामिन्प्रश्नोऽयं क्रियते मया ।
यदुत्तरमहं श्रुत्वा कृतार्थः स्यां भवन्मुखात् ॥ ४८ ॥

अर्थ:- शिष्य अपने गुरु से कहता है, हे स्वामिन् ! मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ कृपा करके इस प्रश्न का उत्तर दीजिये । क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर आपश्री के मुखारविन्द से सुनकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा ।।

को नाम बन्धः कथमेष आगतः
कथं प्रतिष्ठास्य कथं विमोक्षः ।
कोऽसावनात्मा परमः क आत्मा
तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम् ॥ ४९ ॥

अर्थ:- शिष्य ने पूछा – हे दयासिन्धु ! यह देहरूप बन्धन क्या वस्तु है ? और यह कैसे हुआ कैसे यह स्थिर है क्या आत्म वस्तु है और अनात्म वस्तु क्या है और इन दोनों का विवेक कैसे होता है ? यह सब दयाकरके कृपया मुझसे कहें ।।(विवेक चूड़ामणि ४९ ।।)

श्रीगुरुवाच:-
धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पावित ते कुलं त्वया ।
यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ॥ ५० ॥

अर्थ:- ऐसे विनीत भाव से युक्त शिष्य का वचन सुनकर आचार्य बोले – तुम धन्य हो, अर्थात् एक मानव का जो कर्तब्य है वही तुम कर रहे हो या कर चुके हो । क्योंकि तुमने अपना कुल पवित्र किया है, जो तुम अज्ञान के बंधन से मुक्त होने के प्रश्न करते हो, इस तरह की जिज्ञासा जो मनुष्य को ब्रह्म बनती है उस तरह की जिज्ञासा रखते हो या तुम्हारे मन में आई है ।।५१।।

ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः ।
बन्धमोचनकर्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन ॥ ५१ ॥

अर्थ:- क्योंकि पिता का ऋण मोचक पुत्र ही होता है लेकिन इस संसार के बंधन से मुक्ति के लिए खुद को प्रयत्न करना पड़ता है । अर्थात् हमारी मुक्ति के लिए कोई दूसरा कुछ नहीं कर सकता अपने खुद के यत्न से ही मुक्ति संभव है ।।५१।।

ये वार्ता तो बहुत ही लम्बी है, लेकिन इसका अभिप्राय आपलोगों को मैं बता दूँ । गुरु कहता है, की बेटा तुम्हारी जिज्ञासा तो सर्वोत्तम कोटि की है । लेकिन ये ऐसे एक वार्ता से ही पूर्ण होनेवाली अर्थात परिणाम तक पहुँचाने वाली नहीं है ।।

इसे पाने के लिए सबकुछ त्यागकर जो दाढ़ी-झोटा बढ़ाकर फकीरों की तरह घूमते रहते हैं, उनके चरणों की धूलि से स्नान वर्षों-वर्षों तक जब करोगे तो शायद ये संभव हो जाय । जिन्हें हमारा समाज पाखण्डी कहता है, जिन्हें जीवन जीने की कला नहीं आती, जो वेळ एजुकेटेड नहीं हैं ऐसे पाखंडियों के भीड़ में कहीं कोई ऐसा भी होता है, जो तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य की ओर अग्रसर कर सकता है ।।

पहली बात ऐसे साधुओं के समाज को देखने का नजरिया बदलो । क्योंकि - ना जाने केही रूप में नारायण मिल जाय । इसका सबसे बड़ा प्रमाण पांडवों के राजसूय यज्ञ में साक्षात् नारायण का ऐसे पाखंडियों का पैर धुलना ।।

राम ने रावण को केवल एक सीता के लिए अथवा अपने आस्तित्व के लिए नहीं मारा । बल्कि इसलिए मारा की रावण कहता था, कि पाखंड मत करो, सच्ची साधना करो और पाखण्डी साधुओं के खून निकलता था । और वही खून घड़े में जमकर के मिथिला में धरती के निचे दबा दिया । भगवान ने कहा की उन्हीं पाखंडियों का खून जिससे उत्पन्न हुई स्त्री के कारण तुम्हारा अन्त होगा क्योंकि उस दिन तुम भी पाखंड किये बिना नहीं रह पाओगे ।।

जबकि राम की मान्यता यह थी की पाखंड के बिना तो कोई रह ही नही सकता । इस शरीर में आत्मा के अलावा बाकि सब पाखंड है । और बाकि का तो क्या कहना ? दीवाली में लोग एक रुपया किसी को दान नहीं कर सकते जबकि हजारों से लेकर लाखों तक के पटाखे फूंक डालते हैं इससे बड़ा पाखण्ड और कहाँ होगा ?

अभिप्राय यह है, कि लोग बहुत तरह की बातें और बहुत तरह की दलीलें देते हैं परमात्मा के बारे में और एक तो किसी ने कोई सिनेमा भी बनाया है omg. तो सभी की अपनी-अपनी अलग-अलग मत होती है, लेकिन कड़वी सच्चाई ये हैं, की बड़े से बड़े महलों में लोगों को रात-रात भर नींद नहीं आती जबकि सड़क पर कुछ लोग इतनी खर्राटें भरते हैं, कि कोसों दूर से सुनाई पड़ती है ।।

अर्थात भक्ति प्रथम चरन है, और मुक्ति अंतिम । और भक्ति से ही मुक्ति का मार्ग आरम्भ होता है । अब जिन्हें ये लगता है, की उन्होंने प्रथम चरन पार कर लिया है, उन्हें दुसरे चरन बढ़ाने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसकी सच्चाई तो तब पता चलेगी जब इस मार्ग पर कदम रखेंगें ।।

मुझे लगता है, साधू सेवा, दान और जानने की जिज्ञासा यही मुक्ति का मार्ग है अथवा उस मार्ग को सहज एवं सरल बनाती है ।।

सभी सदा सुखी एवं सदा प्रशन्न रहें । भगवान लक्ष्मीनारायण सभी का नित्य कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

।। नमों नारायण ।।

 
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